Monday, June 15, 2015

चोर

स्टेशन के पास खड़े ठेले से दस वर्षीय वह लड़का मुट्ठी भर सिका चना उठाकर भाग खड़ा हुआ। चने वाला चिल्लाया, ‘‘पकड़ो, पकड़ो, चोर!’’ लड़का पूरी ताकत से दौड़ा, मगर लोगों ने उसे धर दबोचा। दो–चार झापड़ रसीद कर दिए। उस समय भी कुछ चने उसके मुंह में और कुछ कसी मुट्ठी में थे। उसे पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। पुलिस द्वारा सुताई करने पर उसने बताया कि वह परसों ही गांव से आया है। उसके मां–बाप सामूहिक हत्याकांड में मारे गए हैं। दो दिन से भूखा था, इसीलिए ठेले से चने उठा लिए थे। पर पुलिस वालों ने एक न सुनी। सींखची में बंद कर दिया। देर तक वह सिसकता रहा। भूख और पीड़ा के कारण देर तक नींद नहीं आई। सोने से पहले, आदत के अनुसार, उसने गले में पड़ी सोने का पानी चढ़ी चैन से लटक रही साईं बाबा की छोटी–सी तस्वीर को हाथ से छूकर नमन किया।
सुबह नींबू टिकाने जैसी मूँछों वाले कांस्टेबल ने डंडा बजाते हुए जगाया तो आदत के अनुसार साईं बाबा को स्मरण करने के लिए उसने चैन टटोली। वह वहाँ नहीं थी।

Dr.Mukesh Pandey New Holi Album : "Holi Re Rasiya "

album : hori re rasiya
lable : times music
music & lyrics : Dr.Mukesh Pandey
Singer : malini
bhojpuri holi album mukesh pandey


FILM : YE KAISA PYAR HAI, Producer & Director : Sheel Singhal ,Music : Tarun Toofani ,Lyrics : Mukesh Pandey





Wednesday, May 20, 2015

जनता टूटती रही, राजनेता लूटते रहे

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने स्वतन्त्रता दिवस पर अपने पहले राष्ट्र-संदेश में, चलो एक बात तो खुलेआम कबूल की है कि वे जनता के सेवक नहीं बल्कि जन-सेवकों के चौधरी हैं यानी 'प्रधान सेवक' - 'मी लॉर्ड, पॉइंट मे बी नोटेड डाउन!"
अब यह जन-सेवक कौन है जिनका मोदी जी अपने-आप को सरदार, चौधरी या प्रधान बता रहे हैं? वही न जो पिछली सरकारों में भी शामिल थे और लोग जिन्हें चोर-उचक्के समझती थी! मोदी जी की सरकार में उनके आने के बाद क्या उनका चरित्र बदल गया है? क्या उन्होंने गंगा-स्नान कर लिया है जो उनके सब पाप धुल गए हैं? साँप को दूध पिलाने से क्या साँप डसना छोड़ देता है?
यह साली जनता ही बेवाकूफ है, जो चौबीसों घंटे पहले गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, हिंसा, रिश्वत, आदि के रोने रोती है और फिर एक ही जलसे के बाद नेता की बातों में आकर तालियाँ पीटने लगती है!
प्रधान मंत्री मोदी जी ने अपने भाषण में भारत के घरेलू स्तर पर विकास और विश्व स्तर पर प्रतिष्ठा कायम करने के लिये स्वामी विवेकानंद जी के योगदान को सराहा। इसके अलावा उन्होंने अरविंद जी को भी सराहा, उनको एक योगी और महाऋषी बताया और स्वीकारा कि वे ऐसे मुनियों और संतों का आदर करते हैं। मोदी जी ने कहा कि उनके मन में अरविंद जी के लिये बहुत श्रद्धा है क्योंकि अरविंद जी ने कहा था, "भारत की दैवी शक्ति विश्व-कल्याण में एक अहम भूमिका निभायेगी.!
अरविंद जी का नाम मोदी जी के भाषण में सुनकर मेरा मन गदगद हो गया। मुझे बिलकुल भी अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। अपनी बगल में खड़े एक भद्र पुरुष से मैंने पूछा, "क्या अभी-अभी मोदी जी ने अरविंद केजरीवाल का नाम लिया?...क्या उनके काम को सराहा? क्या उनका लोहा माना? अनायास ही मेरे मुख से निकल पड़ा - "नेता हों तो मोदी जी जैसे ...भारत माता की जय...!"
जवाब में मेरे पड़ोसी व्यक्ति ने पहले अपना सिर सहमति में नीचे किया जैसे हाँ कर रहा हो फिर उसके बाद उसने अपने सिर को दायें से बायें और बायें से दायें कई बार हिलाया और कहना शुरू किया – "मोदी जी ने महर्षि अरविंद का नाम लिया है न कि अरविंद केजरीवाल का!"
मोदी जी ने अपने भाषण में सभी 'भाईयो-बहिनो' से "स्वच्छ भारत" बनाने का संकल्प किया। आप मुझसे चाहे शर्त लगा लें लेकिन मैं गल्त नहीं हो सकता । अगर मैं गलत साबित हो जाऊँ तो मैं आपको दस मूँगफलियाँ दूँगा और अगर आप शर्त हार जाएँ तो आप मुझे 100 डालर देना। लाल किले के मंच से मोदी जी चाहे अपने मुँह से हमारे इर्द-गिर्द फैली गंदगी को साफ करने की बात कर रहे थे लेकिन उनके मन में 'आप' (ए.ए.पी.) पार्टी और इसके मुख्य नेता केजरीवाल, श्री कुमार विश्वास (कोई दीवाना कहता है वाले) आदि लोगों की याद आ रही थी। अब रही बात साफ़ सफाई की - तो सफाई एएपी से ही शुरू की जायेगी - "ई" से 'इकनोमिकल, "ई' से 'ईज़ी' और "ई" से 'एंवायर्मेंटली सेफ़' भी रहेगी, क्योंकि आम आदमी पार्टी के सदस्यों के पास अपने झाड़ू भी हैं और इन्होंने मोटरसाइकल भी रखे हुये हैं जिनको लेकर यह गली-मुहल्लों में घूम रहे हैं, और आम जनता का दिमाग खराब किया हुआ है!
लोगों को करप्शन (रिश्वत-घोटाले), हिंसा आदि मसलों की याद है या नहीं लेकिन 'आप' ने इतना शोर मचा रखा है कि जनता हरदम इसी सोच में डूबी रहती है जिसके परिणामस्वरूप हम प्रगति की राह पर न तो चल सकते हैं और न ही चलने की सोच सकते हैं। यह विकास के मार्ग पर चलने की दिशा और राह में सरकार के लिए बाधक हैं। अगली गांधी जयंती तक इस समस्या का हल करना है, मोदी सरकार ने! इन 'आप' वालों की बोलती बंद करनी है या फिर इनको किसी न किसी तरीके से सलाखों के पीछे बंद करना है। ऐसा करने के बाद ही भारत के लोग विकास के पथ पर अग्रसर होने की सौच सकते हैं।
"गांधी जी को भी सफाई बहुत पसंद थी। आज गांधी जी अगर हमारे इर्द-गिर्द यह फैली गंदगी देखेंगे तो हम पर छी-छी करेंगे। उन्हें हम इसका क्या कारण देंगे?" मोदी जी ने जनता से पूछा।
मोदी जी ने "मेक इन इंडिया' के महत्व पर भी ज़ोर दिया। देशवासियों, अगर यह भी हम नहीं कर सकते तो 'मेड इन इंडिया' की मोहर तो लगा ही सकते हैं । "भाईयो और बहनों, हमारे देश में 'सवा करोड़' लोग हैं, अगर हरेक व्यक्ति एक एक नयी चीज़ भी बनाये या उस पर भारत की मोहर लगाये तो हम आयात की गयी चीज़ों को निर्यात कर के दूसरे देशों में अपनी चीजों के प्रति विश्वास पैदा कर सकते हैं कि भारत में बनी चीज़ें उम्दा हैं और टिकाऊ भी हैं।
सवा करोड़ लोगों की वज़ह से या नेताओं द्वारा गैर कानूनी ढंग से भारत की ज़मीन हथिया लिए जाने के कारण अगर फैक्ट्रियाँ लगाने की कहीं कोई ज़गह नहीं रही तो यह फैक्ट्रियाँ अपने सिर में लगाओ, उनमे खयाली-पुलाव पकाओ और कुछ नहीं कर सकते तो मिट्टी के ठूठे भट्टी में पकाओ (बनाओ), यह भी नहीं कर सकते तो उन्हें बार-बार इस्तेमाल करने वाला ठूठा बनाओ। रेल में 'डेली-पसेंजरी' करने वाले अगर इन ठूठों का इस्तेमाल करेंगे तो ज़रा सोचो इससे कितनी चिकनी मिट्टी बचेगी और प्रदूषण भी कम फैलेगा। मोदी जी ने इसके बाद कहा - सफाई करने के बाद इकट्ठे बैठकर कभी फुर्सत में चाय पीयेंगे। मुझे कितना अपनत्व लगता है, कितना अच्छा लगता है जब आप चाय की बात करतें हैं!
मोदी जी ने 'सवा करोड़' देशवासियों को कदम से कदम मिलाकर - 'सिर्फ एक कदम' -उठाकर आगे रखने को कहा है इससे भारत में हम सवा करोड़ फुट आगे हो जायेंगे। लेकिन, मोदी जी यह भूल गए कि इन सवा करोड़ में दो-दो टाँगें और पैर 'आम आदमी पार्टी' के भी हैं जो इधर-उधर हरेक गली- मुहल्ले और हर गाँव-शहर की और बढ़ रहे हैं! यह भी सुनने में आया है कि कुमार विश्वास भी मोदी सरकार की नज़र में आये हुए हैं। क्योंकि उनकी छवि चुनाव हारने के बाद बढ़ रही है लेकिन घटी नहीं है। मोदी जी के चमचों को यह बात बिलकुल भी नहीं भा रही कि अपनी हार का एक दिन भी मातम मनाये बगैर कुमार विश्वास विदेश की सैर पर निकल गए हैं। लोग तो काम करके पैसा या रुपया कमाते हैं मगर यह जनाब चुटकले और अपनी कवितायें सनाकर 'डालर' कमा रहें हैं।
खैर, कुमार जी को वापिस उतरना तो देहली में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ही है ना? वहाँ उनको इस विदेशी धन पर 90 प्रतिशत आयकर देना होगा। ऐसा कोई कानून नहीं है पर बनाया तो जा सकता है कि नहीं? कुमार विश्वास, केजरीवाल और उनके साथी भी तो भारत माँ के बेटे हैं, हैं ना? यह किसी के तो बेटे हैं न? इनको देश में ऊधम मचाने के लिए तो ज़िम्मेवार ठहराया जा सकता है! अगर हम अपनी बेटियों पर नज़र रखते हैं तो भारत माँ को इस बात का भी पूरा हक है कि वे इन ऊधमियों पर पूरी नज़र रखे और इनकी करतूतों के लिए जवाब तलबी करे और जवाब-देही बनाये!
इन बकरों की माँ कब तक खैर मनाएगी, भला?
यह क्या भई, अब हमारे देश में योजना कमीशन नहीं होगा! योजना कमीशन के बिना भी किसी देश ने भला विकास किया है? योजनायें तो विकास का आधार होती हैं, पहले हमेशा योजना बनती है उसके बाद ही जाकर कोई प्रोजेक्ट शुरू होता है, राजनेताओं के खाने-पीने का सिलसिला शुरू होता है! मेरे मुख़बिर का कहना है कि मोदी जी की यह घोषणा उनके विधायकों को पसंद नहीं आई और इस बात को लेकर उनमें काफी रोष है तथा वे इस मुद्दे पर मोदी जी का समर्थन नहीं करेंगे! मोदी जी ने अपने समर्थकों को खुश करने के लिए एक और घोषणा की है - अभी तक तो सांसद अपने और अपने सगों के लिए महल-नुमा भवन बनाते थे लेकिन अब वे अपने लिए एक पूरा का पूरा 'आदर्श गाँव' बना सकते हैं! इसको कहते हैं, सियासत करना, वाह मोदी जी वाह!
मोदी जी के समर्थकों ने इस बात का भी बहुत शोर मचाया हुआ है कि मोदी जी ने बुलेट प्रूफ केबिन का इस्तेमाल किए बिना जनता को संभोधित किया - क्या यह उनकी लोकप्रियता का एक प्रमाण है?
सच है, मोदी जी ने बुलेट प्रूफ कैबिन का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उनकी सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गये। लगभग 5000 से अधिक पुलिसकर्मी, 2000 से अधिक सेना के नौजवान, जगह जगह सी.सी.टी.वी. कैमरे, लाल किले के आस-पास के मुख्य मार्ग बंद आदि जैसे कई अन्य प्रबंध किए गये। यदि एक बार आप फिल्म को घुमा कर देखें तो आपको जगह-जगह पर काले कोटों में, धूप का चश्मा लगाये, हाथ में ब्रीफकेस लिये नौजवान दिखाई देंगे। मंच पर ही मोदी जी के 3 गज के घेरे में पाँच जासूसी कर्मी मौजूद थे। इसके इलावा सफैद वर्दी में दर्जनों और भी उनकी हिफाज़त के लिये वहाँ पर मौजूद थे। क्या आप समझते हैं कि यह वर्दीधारी वहाँ टाफ़ियाँ बेच रहे थे या गुबारे? लेकिन, यह कहने से मेरा यह अभिप्राय नहीं की मोदी जी की सुरक्षा के लिये यह प्रबंध नहीं होने चाहिये थे। प्रधानमंत्री जी की हिफाज़त करना देश का फर्ज़ है और शान भी! एक बार मैंने और नोटिस की कि मोदी जी का भाषण लंबा होने के कारण लोग 'बोर' होते दिखाई दिये, वह उबासियाँ लेते दिखे। अगर आप कभी श्रीमती इन्दिरा गांधी या दूसरे भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों के भाषणों की टेप देखें तो आपको रोमांचित होकर बार-बार तालियाँ पीटने की गूँज सुनाई देगी जो मोदी जी के इस समारोह से लगभग गायब थी! मोदी जी के भाषण अक्सर दो कारणों से लंबे हो जाते हैं – एक तो वे समझते हैं कि जनता भुलक्कड़ है, वह भूल जाती है कि क्या हो रहा है इसलिए उन्हें बार-बार बताना पड़ता है या फिर मोदी जी खुद भुलक्कड़ हैं कि वे अपनी बातों को पहले भी अपने चुनाव अभियान के दौरान सैंकड़ों बार दोहरा चुके हैं!
मेरे एक अन्य मुख़बिर के अनुसार श्री केजरीवाल द्वारा अपने जन्मदिन को 15 अगस्त वाले दिन मनाये जाने को भी एक षड्यंत्र बताया जा रहा है। यह जन्मदिन किसी और दिन नहीं मनाया जा सकता था, क्या? उन्होंने पिछले साल तो इस तरह अपना जन्मदिन नहीं मनाया था फिर इस बार क्यूँ? केजरीवाल जी के जन्मदिन पर "सोशल मीडिया" का बाज़ार काफी गरम था। उनके जन्म-दिन पर उनके समर्थकों ने जो गतिविधियाँ कीं उससे भी कई लोगों का ध्यान मोदी जी के भाषण से हटा। अमेरिका में लोग अपने बच्चों का जन्मदिन अपनी सुविधानुसार किसी और दिन मनाते हैं कि नहीं? अगर केजरीवाल साहिब अपना जन्मदिन किसी और दिन मना लेते तो क्या मुसीबत आ जानी थी? हारे हुये 'आप' के नेता का जन्मदिन क्या प्रधानमंत्री के राष्ट्र-संदेश से ज़्यादा महत्वपूर्ण था, क्या? इस गुस्ताखी के लिए उन्हें कभी भी माफ नहीं किया जाएगा!
एक उड़ती-उड़ती आई खबर के मुताबिक अब से पहली से आठवीं कक्षा तक के छात्र अब से पास-फेल हुआ करेंगे! वाह, मोदी जी वाह, किनकी बातों में आ गए है और हम गरीबों को साज़िश का शिकार बना रहे हैं। प्रधानमंत्री जी हमारी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों को पास-फेल करना नहीं होना चाहिए बल्कि इतना ही काफी है की वे कुछ अच्छा और कुछ नया सीखें!
"बेड़ा गर्क हो नसीब का, क्यूँ हर बार फेल हो जाता है बच्चा गरीब का" अब हम यह पंक्तियाँ भूल गए हैं, मोदी जी! क्या आप नहीं चाहते कि हम गरीबों के बच्चे पढ़-लिख कर प्रधानमंत्री बने न कि फेल होकर चाय वाले की दुकान पर लग जाएँ या खुद का चाय का खोखा खोल लें! अगर ऐसा कोई ‘फाइनल’ हुआ है तो उस पर पुनर्विचार होना चाहिए।
अपने देश में मैंने आज तक जो भी होते हुये अपनी आँखों से देखा है उसके आधार पर मुझे यह कहने में ज़रा-सा भी संकोच नहीं हो रहा कि
जनता टूटती रही, राजनेता लूटते रहे
द्रोपदी लुटती रही नये कौरव पैदा होते रहे!
जनता पानी, राशन, तेल को तरसती रही,
हर पल शोषण की चक्की में पिसती रही।
नेता अपने कोठे भरते रहे,
अंधे अपनों को रेवड़ियाँ बाँटते रहे!
अली बाबा और चालीस चोर हर दम खज़ाने लूटते रहे,
कोई करिश्मा होने की उम्मीद में, लोग जीते रहे, मरते रहे!
भारत माँ की जय!

हवालात में आप पुलिस सुरक्षा में हैं।

वह महिलाथानेदार के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। थानेदार की आँखों में चेतावनी थी कि वह अक्षम्या अपराध कर रही है। कोई अपनी इच्छा से थानेदार के सामने बैठने का साहस कैसे कर सकता है। ... किंतु महिला अनपढ़ थी। उस भाषा को पढ़ नहीं सकी। बोली, “मेरा नाम तस्ली़मा नसरीन है।
 “तो अचार डालूँ उसका?”
नहीं। आपको वह कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। अचार तो वे डालेंगेआपके देश का।
कौन?”
जो मेरा सिर माँग रहे हैं।
'क्या करेंगे आपके सिर कायह कोई गोभी का फूल तो है नहीं कि इसे पका कर खाएँगे।
रसोई से बाहर निकल थानेदार।” महिला ने कहा, “मैं अपराध जगत् की बात कर रही हूँ। उन्होंने मेरी हत्या की सुपारी दी है। वे मेरा सिर लाने वाले को घोषित रूप से पुरस्कृत करने की घोषणा कर रहे हैं।
देखो मैडम।” थानेदार बोला, “यदि किसी साधारण व्याक्ति ने सुपारी दी हैतो हम अभी उसे हथकड़ी पहना कर सीखचों के पीछे धकेल देंगेकिंतु ...
किंतु क्याकानून तो सबके लिए एक होता है।
नहीं। हमारे यहाँ आरक्षण का प्रचलन है। कुछ लोग कानून से आरक्षित हैं। वे जब चाहेंकानून का सिर माँग सकते हैं। वे कानून की हत्या की भी सुपारी दे सकते हैं।
कौन लोग हैं?”
कांग्रेस पार्टी। हमारे प्रधान मंत्री। हमारे शासक।
किंतु मेरा सिर तो कुछ मुस्लिम संगठन माँग रहे हैं। उसमें कांग्रेस का कोई हाथ नहीं है।
माँग तो मुस्लिम संगठन ही रहे होंगेऔर अपने धर्म के नाम पर माँग रहे होंगे। किंतु उन्हें ये माँगें कांग्रेस सरकार ने परोसी हैंऔर यह सब माँगने का साहस भी कांग्रेस सरकार ने ही दिया है। अफ़ज़ल को माफी न दी जाएयह माँग किसकी है?”
कांग्रेसी मुख्येमंत्री की।
उसकी फाइल किसने रोक रखी हैएक दूसरी कांग्रेसी मुख्यभमंत्री ने। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह मानते हैं कि सिख शक्तियों ने मुगलों से लड़ कर अच्छा नहीं कियाइसलिए वे उसकी क्षतिपूर्ति कर रहे हैं। वे मुगलों का राज्य लौटा देना चाहते हैं।
कैसे?”
उन्हें केवल मुसलमानों को शिक्षा देने की चिंता है। शिक्षा नहींतालीम। हिंदी या भारतीय भाषाओं में नहींउर्दू में। ...
क्यों?”
ताकि इस देश के मुसलमानों और अन्य धर्मावलंबियों की भाषा कभी भी एक न हो सके। वे हिंदुओं से पृथक और दूर रहें।
पर क्यों?” तस्लीमा नसरीन ने पूछा, “हमने बांगलादेश में उर्दू का विरोध किया था।
तुम्हारे प्रधान मंत्री मनमोहन‍ सिंह नहीं थे न। न शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह थे। न वहाँ सोनिया गांधी जैसी कोई महाशक्ति थी।” थानेदार ने कहा, “मनमोहन सिंह चाहते हैं कि शिक्षा केवल मुसलमानों को दी जाए। वे शिक्षित हो जाएँ तो नौकरियाँ केवल उनको ही दी जाएँ। उनके लिए नौकरियों का आरक्षण भी हो चुका है। उन्हें  मकान बनाने के लिएव्यापार करने के लिए तथा अन्य कामों के लिए धन भारत सरकार दे। ...
पर तुम्हारी सरकार तो सेकुलर है। भारत इस्लामिक देश नहीं है। फिर यह सब क्यों?”
हमारे देश में सेकुलर का अर्थ इस्लामिक ही होता है।” थानेदार मुस्कराया, “कांग्रेस एक पाकिस्तान 1947 ई. में बना चुकी है। कश्मीर को भी व्यवहारत: इस देश से काट ही चुकी है। उसका मन भरा नहीं है। वह आसाम को भी भारत से पृथक करके ही दम लेगी। और तब तक नए पाकिस्तान बनाती ही चली जाएगीजब तक यह सारा देश पाकिस्तान नहीं बन जाएगा।
यहाँ भी पाकिस्तान बन जाएगा?”
प्रयत्न  तो यही है।
तो इसीलिए वे मुझपर आक्रमण करने का साहस कर रहे हैंमेरा सिर माँग रहे हैं?”
अब आप ठीक समझीं।” थानेदार मुस्कराया, “यह तो सरकार के एजेंडे पर है।
मैं तो समझती थी कि मैं यहाँ सुरक्षित हूँ।” तस्लीमा घबरा गईं।
आप सुरक्षित हैं मैडम।” थानेदार बोला, “वे लोग आपका सिर ही तो माँग रहे हैं। मनमोहन सिंह कब से अपना सिर उनके चरणों में डाल चुके हैं। वे तो स्वयं को सुरक्षित ही मानते हैं।
मैं तो सोच रही थी कि मैं प्रधानमंत्री से अपनी सुरक्षा की गुहार करूँगी।
आपकी सुरक्षा !” थानेदार बोला, “दैट इज़ नो प्राब्लम। उसका प्रबंध हो चुका है।
सच?”
हाँ। उनका आदेश आ चुका है कि आपके विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज कर आपको हवालात में डाल दिया जाए।
इसका क्या अर्थ हुआ?” तस्लीमा चौंक कर उठ खड़ी हुईं।
हवालात में आप पुलिस सुरक्षा में हैं। कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। बहुत से बहुत वे आपका सिर माँग लेंगे। वह हम उनको दे देंगे। शेष आप सारी की सारी सुरक्षित हैं।
और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता?”
वह आपको प्राप्त हैयदि अल्पसंख्यक आयोग आपको उसकी अनुमति दे और कट्टरपंथी मुल्लाओं को उसमें कुछ आपत्तिजनक न लगे।
यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कॉपी राइटभारत के संविधान से छीन करउन्हें किसने दे दिया?”
हमारी महान् भारत सरकार ने।” थानेदार हँसा, “अच्छा आइएआपकी सुरक्षा का प्रबंध कर दूँ।” थानेदार ने हथकड़ी अपने हाथ में ले लीऔर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

अगर ऋषि अष्टावक्र आपके समय में हुए होते

व्यंग्य का शौक उन्हें बचपन से था। हर आदमी को अपना कार्य क्षेत्र व प्रतिबद्धताएँ तय करनी पड़ती हैं। जब वे तीन वर्ष के थे तभी उन्होंने निश्चय कर लिया था कि लोग अगर मानसिक विकृतियों व सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य लिखते हैं तो मैं लोगों की शारीरिक बीमारियों, क्षेत्रीय बोलियों व मानसिक परेशानियों पर लिखूँगा। कुछ लेखक इनका प्रतीकात्मक इस्तेमाल करते हैं तो मैं वो भी नहीं करूँगा। मैं सीधे-सीधे इन्हीं पर लिखूँगा। सो पहले दिन से ही आप एक हाथ में कापी-कलम-दवात और दूसरे में इंच-टेप थर्मामीटर व स्टेथस्कोप लेकर घूमते थे। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के निर्णायकों की तरह आपने भी आदमी की एक आदर्श नाप बना ली थी। कोई अगर कम ज्यादा होता तो आप तुरन्त उस पर व्यंग्य लिख देते थे। अगर ऋषि अष्टावक्र आपके समय में हुए होते तो सात-आठ सौ व्यंग्य तो आपने उन्हीं पर लिख डाले होते। कुब्जा और मंथरा के शरीरों पर आपने एक भी व्यंग्य क्यों नही लिखा, शोध का विषय है।
छुटपन से ही आप बुरी तरह सृजनात्मक थे। बच्चों की पत्रिकाओं में आपने छियालीस व्यंग्य एक ऐसे पड़ोसी पर लिखे जो हकलाता था। तिरेपन व्यंग्य आपने उस महिला पर लिखे जो न को ल कहती थी। तीन सौ व्यंग्य अकेले आपने उस आदमी पर लिखे जिसका पेट मोटा था। ढाई सौ व्यंग्य आपने पतले आदमी पर और सवा दो सौ व्यंग्य गंजों पर लिखे। हाँलांकि उक्त शारीरिक क्षेत्रों में से कईयों में आपका भी अच्छा-खासा दखल था। मगर उक्त सामाजिक प्रतिबद्धताओं की वजह से आप इतना व्यस्त रहते थे कि अपने लिए आपको समय ही नहीं मिलता था। एक बार आपके शहर में एक विकलांग बच्चा पैदा हो गया। तब कुछ लेखकों ने चिकित्सा-तंत्र पर लेख लिखे। कईयों ने प्रशासन के ढीलेपन पर व्यंग्य लिखे। कुछ ने बच्चे के माँ-बाप को लापरवाही बरतने का दोषी ठहराया। कई पत्रिकाओं ने इस बीमारी पर लेख छापे। मगर आपकी तो बात ही कुछ और! आपने उस बच्चे पर और उसके विकल अंगों पर व्यंग्य लिखे। आपकी मौलिक सोच के अनुसार कसूर न प्रशासनिक अक्षमता का था, न चिकित्सा तंत्र का, न माँ-बाप का। खुद बच्चा इस सबके लिए दोषी था, क्यों कि जन्मजात विकलांग था। इस तरह बाल-पत्रिकाओं की मार्फत बच्चों में अच्छे संस्कार डालते-डालते कब आप बड़े हो गए, न तो आपको पता चला न ही दूसरों को।
बड़े हुए तो स्वाभाविक था कि लोगों से आपके विचार टकराने लगें। एक बार तो आपको कुछ लेखकों के विचार इतने बुरे लगे कि आपने फौरन सम्बद्ध शहरों में मौजूद अपनी ’अमूर्त्त साहित्यिक-गुप्तचर-संस्था’ के एजेण्टों से उन लेखकों के शरीरों और बीमारियों के ’डिटेल्स’ मँगाए। तब आपने तिहत्तर व्यंग्य उनके शरीरों पर और पिच्यासी उनकी बीमारियों पर लिखे। हरियाणवी बोली पर एक सौ सैंतीस और बिहारी बोली पर दो सौ एक व्यंग्य आपने इसलिए लिखे कि इन प्रदेशों में रहने वाले कुछ लेखकों व राजनेताओं से आपके ’वैचारिक मतभेद’ थे। इसी क्रम में छप्पन व्यंग्य आपने एक मुख्यमंत्री की नाक पर और चौवालीस एक प्रधानमंत्री के बालों पर लिखे। एक पड़ोसी के चश्मे पर आप अभी तैंतीस व्यंग्य ही लिख पाए थे कि उसने चश्मा लगाना छोड़ दिया। आपके दिल को ठेस पहुँची। तब आपने उसकी आँखों पर बाईस व्यंग्य लिख डाले और डिप्रेशन से बाहर आ गे। अण्डा होती जा रही आपकी सृजनात्मकता फिर से चूजे देने लगी। इसी सृजनात्मकता को निचोड़ कर आपने तकरीबन ड़ेढ़ हजार व्यंग्य लोगों के नामों को बिगाड़ते हुए लिखे और लगभग पौने दो हजार व्यंग्य पत्नी की कथित मूर्खताओं पर लिखे।
आपके दोस्ती के सर्किल में ज्यादातर लोग प्रतिभावान थे। और अलग-अलग ढंग से अपनी मेधा का इस्तेमाल करते थे। उदाहरणार्थ आपके एक मनोचिकित्सक मित्र तनाव के क्षणों में ओझा से झाड़-फूँक करवाते थे। ’अंध-विश्वास हटाओ’ समिति में मौजूद आपके कई मित्रों ने शताब्दी की सर्वाधिक ऐतिहासिक चमत्कारिक घटना के तहत गणेश जी को कई लीटर दूध पिलाया था। ’दहेज उन्मूलन संस्था’ के आपके कुछ मित्र किसी भी आपात-स्थिति के लिए हर वक्त किरोसिन तेल के पीपों से लैस रहते थे। आपके एक राष्ट्र-प्रेमी मित्र दंगों को देश-भक्ति का पर्याय मानते थे। आपके एक कामकाजी मित्र नाइन-टू-फाइव अपने दफ़्तर में टँगे मेज पर और धड कुर्सी पर फैला कर पड़े रहते थे। महीने के महीने दस हजार तनख्वाह के और बीस हजार ऊपर के ले आते और मेहनती होने का खिताब पा जाते थे। एक अन्य मित्र जो अमीरों से बहुत नफरत करते थे, सिर्फ उन्हीं माफियाओं से संबंध रखते थे जो गरीब से अमीर बने होते थे। दिन में उनके प्रेम के पट्टे में बंधे सामाजिक असमानताओं पर नजर रखते और नाइट-शिफ़्ट में पट्टा खुला कर अन्य कलात्मक धंधों पर निकल जाया करते थे। आपके एक मानवतावादी मित्र जो मनुष्य की भलाई के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे, रात को जिस बदनाम चिंतन को कांट-छांट कर अपना बना लेते थे, दिन में उसे दुत्कार कर दूर भगा देते थे। मानव जाति के हित में जब मन ओ व्यक्तिवादी बन जाना और जब इच्छा हो सामाजिक हो जाना उनकी मीठी सी मजबूरी थी। सभ्यता-संस्कृति के कट्टर संरक्षक आपके एक मित्र जो सामने हर स्त्री को माँ-बहन-बेटी-देवी जपते थे, पीछे उनका जिक्र एक आँख दबा कर कादर खानीय मुद्रा में द्विअर्थी संवादों के जरिए किया करते थे।
सामाजिक कार्य आपको बचपन से ही माफिक आते थे। आपको बडा अरमान था कि आप कुछ विधवाओं को पालें। ’विधवा-पालन’ का शौक आपको जुनून की इस हद तक था कि आप दूसरी सामाजिक समस्याओं को ठीक से समझ तक नहीं पाते थे। मगर आपकी बदकिस्मती कि कई सालों तक कोई स्त्री विधवा न हुई। कई सालों के लम्बे इंतजार के बाद एक बार जब आप कश्मीर में थे, आपको सूचना मिली कि कन्याकुमारी में एक स्त्री विधवा हो गयी है। आपकी खुशी का ठिकाना न रहा। किसी ने ठीक ही कहा है कि धैर्य का फल मीठा होता है। आप पूरे इन्तजाम के साथ वहाँ गए और उस विधवा को साथ ले आए। हालांकि उसने पचासियों बार कहा कि उसे मदद की कोई जरूरत नहीं है।, वह पढ़ी-लिखी है, हर तरह से सक्षम है, आप से ज्यादा कमा सकती है, आपसे बेहतर ढंग से परिवार को पाल सकती है। मगर आप नहीं माने। इतने सालों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद अच्छा काम करने का जो इकलौता मौका हाथ लगा था, आपसे छोड़ते न बना।
इन्हीं सब महानताओं की वजह से आप बचपन से ही मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे। मुझे इस बात का सख्त अफसोस है कि आपका यह ’एकलव्य-शिष्य’ आपकी तरह लायक नहीं बन पाया। बडी इच्छा थी कि आपसे मिलकर अपने शरीर में कमियाँ निकलवाऊँ और बीमारियाँ गिनवाऊँ। (मगर इस कशमकश में भी हूँ कि आपसे अँगूठा कटवाऊँ या आपको अँगूठा दिखाऊँ!?!?)
काश! आप जीवित होते!
पुनश्च:- आपकी विनम्रता ऐसी कि आप हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्र नाथ त्यागी आदि को अपने समकक्ष मानते थे। अगर नहीं भी मानते तो कोई क्या कर लेता!?

Saturday, May 16, 2015

सरकार की आयु भले एक वर्ष है, पर उसके दो बजट आ गए हैं।


कैसा विकास चाहते हैं? उनका आर्थिक-सामाजिक विकास का विचार दशर्न क्या है, उसे वह व्यावहारिक बनाने के लिए क्या कर रहे हैं?..आदि प्रश्नों का सही उत्तर तलाशने के लिए हमें बनी हुई या लगातार बनाई जा रहीं धारणाओं के कारागार से रिहा होकर निष्पक्षता से विचार करना होगा। दरअसल, मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनने उम्मीदवार बनने के पूर्व ही अपनी विकास कल्पना भाषणों के माध्यम से देश के सामने रखी, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में एवं बाद में उम्मीदवार बनाए जाने के बाद सार्वजनिक भाषणों तथा पार्टी कार्यक्रमों में उसे विस्तार दिया। उन सबका निचोड़ चुनाव घोषणा पत्र में आया। फिर, प्रधानमंत्री बनने के बाद अनेक कार्यक्रमों तथा उस दौरान के उनके भाषणों के बाद हम इस स्थिति में हैं कि उनकी अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकें। सरकार की आयु भले एक वर्ष है, पर उसके दो बजट आ गए हैं। अनेक कार्यक्रमों की घोषणाएं हो गई हैं, जिनमें सरकार की विकास यात्रा संबंधी पूरी विचारधारा स्पष्ट हो जाती है। मोदी ने अपनी राजनीति का सूत्र यह बनाया कि बेहतर आर्थिक विकास ही बेहतर राजनीति है। इसे वह प्रधानमंत्री बनने के बाद आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में जितने प्रयोग किए, उनके अनुभवों से कुछ विचार सुदृढ़ हो चुके हैं। मसलन, भारत सहित दुनिया में जो आर्थिक ढांचा सुदृढ़ है, उसको ध्वस्त करके नए सिरे से निर्माण का विचार कोरी कल्पना है। इसलिए जब उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपने पदार्पण के सूत्रपात के लिए 6 फरवरी, 2013 को पहला भाषण दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दिया तो कहा कि इन्हीं ढांचों, संसाधनों और व्यवस्थाओं में भारत को दुनिया के विकसित देशों की कतार में खड़ा किया जा सकता है। इसका अर्थ यथास्थितिवादी होना नहीं था, और उनने आगे के भाषणों और कदमों से साबित किया है कि उनका विचार और आचरण दरअसल, यथास्थितिवाद पर चोट करने वाला है। उनका मानना है कि खेती, उद्योग और सेवा तीनों के समान योगदान पर विकास का संतुलन हो सकता है। इस समय सेवा अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है, जो खतरनाक है। यही सोच इस आरोप को नकारती है कि मोदी की विकास अवधारणा कॉरपोरेट और उद्योगों पर टिकी है। 17, 18, और 19 जनवरी, 2014 को मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद में भारत और इसके सांस्कृतिक-सामाजिक-आर्थिक विकास की विस्तृत कल्पना रखी थी। मोदी मानते हैं कि वर्तमान दौर में देश, उसका उत्पादन और नेता तीनों अगर ब्रांड के तौर पर विश्व में स्थापित हो गए तो उसे निवेश भी मिलेगा, उसके निर्मिंत सामान व सेवा विश्व भर में खरीदे जाएंगे, उसके लोगों की सेवा विश्व के देश लेंगे तथा नेता की विश्व की नीति-निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। ब्रांड इंडिया की बात करते हुए उन्होंने पांच टी-टैलेंट, टूरिज्म, ट्रेड, ट्रेडिशन और टेक्नोलॉजी की बात की थी। एक वर्ष में उन्होंने विदेशी दौरों और देश में उठाए गए कदमों के सुनियोजित महाप्रचारों व भाषणों से भारत को एक ब्रांड के रूप स्थापित करने की आधारशिला रखी है। इसके परिणाम हमें आने वाले समय में दिखाई देंगे। सच है कि विश्व के आर्थिक व व्यापारिक पटल पर भारत एक ब्रांड के रूप में प्रभाव डालने लगा है। मोदी की सोच में देश ब्रॉड इंडिया बन सकता है, और उसमें ऐसा कर सकने की क्षमता है।‘‘स्किल विकास’ पर बल का कारण‘‘मेक इन इंडिया’ का जो आह्वान मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से किया उसका संकेत वह पार्टी भाषण में दे चुके थे। ‘‘स्किल विकास’ पर सर्वाधिक जोर का कारण यही है कि हमारे यहां अगर निवेश आए तो आवश्यक काम करने योग्य लोग तैयार रहें तथा विश्व में भी काम की मांग के अनुरूप ये जा सकें। इसी भाषण में उन्होंने ‘‘समृद्ध भारत-शक्तिशाली भारत’ के अपने सपने में स्मार्ट सिटी, बुलेट रेल तथा हर राज्य में एक एम्स व एक आईआईटी की कल्पना रखी थी। अपने इसी भाषण में उन्होंने संघवाद को मजबूत करने; यानी राज्यों को सम्मान और अधिकार देने तथा प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों के समूह को एक टीम के रूप में विकास के लिए काम करने की सोच रखी थी। आप देख सकते हैं कि योजना आयोग नीति संस्थान में बदल चुका है। प्रधानमंत्री राजनीतिक मतभेद के बावजूद मुख्यमंत्रियों की टीम के साथ विचार-विमर्श कर विकास संबंधी उपायों पर कम करने की ओर बढ़े चुके हैं। राज्यों की हिस्सेदारी करों से लेकर प्राकृतिक संसाधनों में बढ़ गई है। यह इतना बढ़ रहा है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को केंद्र सरकार को आगाह करना पड़ा कि कहीं इससे केंद्र कमजोर न हो जाए। दरअसल, मोदी की विकास सोच में देश की एकता और अखंडता अविच्छिन्न रूप से समाहित हैं। उनके अनुसार किसी राज्य का विकास देश का ही विकास है। इसलिए उत्तर और पूर्व के जो राज्य आम नागरिक सुविधाओं से लेकर सामान्य आधारभूत संरचना में पिछड़े हैं, उनको अधिक संबल देने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने दो बजटों, कार्यक्रमों तथा उस दौरान की बातों में मोदी ने अपनी सोच का व्यावहारिक रूपांतरण करने की कोशिश की है। कोई एक साल के परिणाम का चाहे जैसे मूल्यांकन करे, पर मानवीय विकास का ऐसा कोई पहलू नहीं रह गया जिसके संदर्भ में मोदी की सोच और कार्ययोजना सामने नहीं आई हो। मोदी की सोच में व्यावहारिकता है। अगर सभी को रहने योग्य घर देना है, तो उनसे उनकी आय की सीमा में उसकी लागत धीरे-धीरे ले ली जाए। ऐसा नहीं है कि वो सोच सारी नई ही है, पर पुरानी सोच पर पड़ी हुई काई को उनने आज के संदर्भ में परिवर्तन, संशोधन व प्रखर वक्तव्यों तथा ‘‘करना ही है’ की कार्यशैली से पुनर्जीवित किया है। मानव सहित गांव और शहर में उपलब्ध हर प्रकार के संसाधन का संपूर्ण उपयोग और उनका पूरा योगदान, उसके लिए जितना संभव है, विचार की प्रेरणा तथा व्यवहार में आवश्यक आधारभूत संरचना उपलब्ध कराना उनकी शैली है। मसलन, देश को यदि स्वच्छ वातावरण, वायु, जल एवं ऊर्जा प्रदान करनी है, जो जीवन के साथ आर्थिक और सामाजिक विकास की प्राणवायु होगी तो हमें नागरिकों के साथ देश को स्वच्छ बनाने का अभियान चलाना ही होगा, नदियों को साफ करना होगा, उन्हें जोड़ना होगा तथा ऊर्जा में कोयला और तेल को कम करते हुए नाभिकीय, वायु और सौर ऊर्जा की ओर बढ़ना होगा। इन दिशाओं में काम आरंभ हो गया। ‘‘नमामि गंगे’ योजना केवल सांस्कृतिक ही नहीं, आर्थिक और सामाजिक विकास की सोच से भी अभिप्रेरित है। मोदी की सोच है कि जिस तरह गांवों की आर्थिक ताकत कमजोर हुई है, लोग केवल रोजगार के लिए ही नहीं, शिक्षा, स्वास्य एवं आम नागरिक सुविधाओं की इच्छा से भी शहरों की पलायन कर रहे हैं, उसे रोका जाए। गांवों में ही सरकार और निजी क्षेत्र के संसाधन तथा गांव वालों के सहयोग से रोजगार से लेकर सुविधाओं का ऐसा ढांचा विकसित कर दिया जाए ताकि उन्हें शहरों की ओर जाना ही न पड़े। भूमि अधिग्रहण विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों एवं रेल पटरियों के दोनों ओर एक किलोमीटर तक के औद्योगिक गलियारे का प्रस्ताव इसी के मद्देनजर है, जिसे संभवत: न समझ पाने या राजनीतिक दुर्भावनाओं के कारण विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उनकी विकास संबंधी सोच में मानवीय संसाधनों की जागरूक और स्वैच्छिक सक्रियता सर्वप्रमुख अंग है। उन्होंने बार-बार कहा है कि विकास जनआंदोलन होना चाहिए। लोग मानें कि वे जो भी कर रहे हैं, देश के विकास के लिए है। स्वच्छता अभियान इसका उदाहरण है। इसी तरह,‘‘श्रममेव जयते’ कार्यक्रम को लीजिए। श्रम के महत्त्व को भारतीय समाज के एक वर्ग में अस्वीकारने की प्रवृत्ति हमारे लिए घातक बनी है। यह काम छोटा और वह काम बड़ा की जगह श्रम की प्रतिष्ठापना तथा श्रमिकों की सुरक्षा के लिए हर संभव व्यवस्था इस कार्यक्रम का अंग है। दो इन्श्योरेंस और एक पेंशन योजना आज तक की सबसे महत्त्वाकांक्षी तथा व्यावहारिक योजना हमारे सामने आई है। ‘‘जन धन योजना’ भी आम आदमी को विकास की धारा में लाने की सोच की ही व्यावहारिक अभिव्यक्ति थी। ‘‘डिजिटल इंडिया’ केवल संपन्नों के लिए नहीं है। दूरस्थ गांवों में रहने वाला भी आधुनिक सूचना तकनीकों का प्रयोग करते हुए विकास में कदम मिलाए, अपनी बात सरकार तक सीधे पहुंचाए और इससे समस्याओं को दूर करने में भूमिका निभाए; इसी सोच से पैदा हुई है। तो कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मोदी विकास को केवल संकुचित आर्थिक उपलब्धियों तथा सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं मानते। संक्षेप में इसे समायोजित करें तो अपनी संस्कृति, प्रकृति और सभ्यता को बनाए रखते हुए भारत की बिल्कुल बदली हुई, तकनीकों का प्रयोग करता हुई आधुनिक तस्वीर, हर वर्ग की सोच और कार्यशैली का आधुनिक युग में रूपांतरण, उन छोटी-छोटी बातों को महत्त्व देना जिनसे विकास में मानवीय गरिमा तथा भविष्य में विकास की गति कायम रहे, भारत के अंदर और बाहर के भारतवंशियों की, जिनकी सामाजिक श्रेणी जो भी हो; इसमें अधिकतम योगदान को सुनिश्चित करने की प्रेरणा, उनकी सामाजिक सुरक्षा और इसकी पुख्ता पण्राली को खड़ा कर देना..उनकी विचारधारा और कार्यधारा के अंग हैं।