Sunday, March 11, 2012

अनन्त के पार जाना सम्भव है क्या ?

अनन्त (Infinity), का विचार गणित में हमेशा से रहा है। संख्यायें 1, 2, 3-------------- अनन्त हैं। किसी रेखा पर बिन्दुओं (Points), की संख्या अनन्त होती है। अगर दो कारें समान्तर रोड पर एक साथ चल रही हैं तो वे आपस में कभी नहीं टकरायेंगी। दूसरे शब्दों में वे अनन्त पर टकराएंगी। अनन्त , एक ऐसा छोर है जिसे लाख कोशिश करने के बाद भी पकड़ा नहीं जा सकता या वहाँ तक पहुँचा नहीं जा सकता।

आधुनिक युग में अनन्त के बारे में गहराई साथ गणितज्ञ जार्ज कैन्टर ने उन्नीसवीं शताब्दी में अध्ययन किया। उन्होंने अनन्त का वर्गीकरण किया काउंटेबिल (गिनने योग्य) तथा अनकाउंटेबिल (न गिनने योग्य) अनन्त के रूप में। गिनने योग्य अनन्त के समूह (Sets), में सदस्य तो अनन्त होते हैं लेकिन उन्हें गिना जा सकता हैं। यहाँ गिनने से मतलब है कि उन्हें एक क्रम में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिये गणित में सम संख्याओं का समूह (2, 4, 6---------), लिया जाये तो यह एक काउन्टेबिल अर्थात गिनने योग्य समूह है। क्योंकि इस समूह की कोई भी सम संख्या अपने एक निश्चित क्रम में होती है। जैसे संख्या 8 का क्रम चौथा है, इसी प्रकार संख्या 1000 का क्रम 500 वाँ है। यहाँ तक कि चाहे जितनी बड़ी सम संख्या ले ली जाये, उसका एक क्रम अवश्य मिलता है।

भौतिक जगत में देखा जाये तो ब्रह्माण्ड में तारों की संख्या (अधिकतर वैज्ञानिकों के अनुसार) अनन्त है। किन्तु यह संख्या काउंटेबिल है। क्योंकि पृथ्वी से तारे की दूरी को क्रम में लेकर सभी तारों को क्रमबद्ध किया जा सकता है। इसी तरह ब्रहमाण्ड में आकाशगंगाओं या ब्लैक होल्स की संख्या या तो सीमित है या फिर अनन्त है लेकिन दूसरी हालत में भी यह संख्या कांउटेबिल है। भौतिक जगत में कोई भी ऐसा समूह दिखाई नहीं देता जिसे न गिनने योग्य अनन्त की कैटेगरी में रखा जा सके। देखा जाये तो आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले तक अनकाउंटेबिल का विचार ही मौजूद नहीं थ।

आईए पहले समझते हैं अनकाउंटेबिल (न गिनने योग्य) अनन्त है क्या! इसे पूरी तरह समझने के लिये गणित के एक और विचार को समझना होगा जिसे कान्टीन्यूटी (Continuity), कहते हैं। अगर किसी ग्रुप में सदस्य इस तरह हैं कि एक को दूसरे से अलग करना मुमकिन न हो तो ऐसा ग्रुप कान्टीनुअस कहलाता है। कल्पना कीजिये एक ऐसे ग्रुप (Set), की जिस में 0 से 1 के बीच की सभी वास्तविक संख्याएं (Real Numbers), मौजूद हैं। यहाँ 0 से जुड़ी (0 के बगल में) या 1 से पहले कौन सी संख्या है? इसे लिखना मुमकिन नहीं, यानि उस संख्या को 0 से अलग लिखना (या 1 से अलग) मुमकिन नहीं। यहाँ तक कि इस समूह की किसी भी संख्या से उसके बगल की संख्या को अलग करके नहीं लिखा जा सकता। इसका मतलब हुआ कि 0 से 1 के बीच वास्तविक संख्याओं का ग्रुप एक कान्टीनुअस ग्रुप है। कान्टीन्यूटी और अनकाउंटेबिल इनफिनिटी के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध् है। अगर कोई ग्रुप कान्टीनुअस है तो उसमें सदस्यों की संख्या हमेशा अनकाउंटेबिल होगी। यानि 0 से 1 के बीच वास्तविक संख्याओं का ग्रुप अनकाउंटेबिल है।

अब भौतिक जगत के बारे में फिर से विचार करते हैं। विचार करते हैं जानदारों को जिंदगी बख्शने वाली हवा और उसमें मौजूद आक्सीजन को। सभी को मालूम है कि आक्सीजन और दूसरे पदार्थ छोटे छोटे कणों से मिलकर बने होतें हैं जिन्हें अणु (Molecules), कहा जाता है। अणु भी और छोटे कणों के मिलने से बनते हैं जिन्हें परमाणु (Atoms), कहा जाता है। हर एलीमेण्ट का एक अलग एटम होता है जिसकी पहचान उसमे मौजूद प्रोटानों की संख्या से होती हैं। जैसे आक्सीजन के परमाणु में आठ प्रोटॉन होते है जो उसके न्यूक्लियस में मौजूद रहते हैं। इतनी ही संख्या में इलेक्ट्रान भी परमाणु में मौजूद होते हैं और न्यूक्लियस के चारों तरफ चक्कर लगाते रहते हैं, यह प्रोसेस लगातार चलती रहती है जिससे आक्सीजन के परमाणु का अपना वजूद कायम रहता है। दूसरे लफ्जों में कहा जाये तो आक्सीजन की जीवनदायनी ताक़त कायम रहे इसके लिये ज़रूरी है कि उसके न्यूक्लियस का वजूद कायम रहे और इलेक्ट्रान उसके चारों तरफ लगातार चक्कर लगाते रहें। यानि एक कान्टीनुअस प्रोसेस होती रहे।

इस तरह आक्सीजन का जीवनदायनी होना एक कान्टीनुअस प्रोसेस का नतीजा है। तो फिर सिद्ध हुआ कि आक्सीजन का वजूद एक कान्टीनुअस प्रक्रिया का नतीजा है, और अगर कान्टीनुअस है तो अनकाउन्टेबिल भी है। अब आक्सीजन के वजूद को और गहराई से देखिये।

आधुनिक एटामिक थ्योरी बताती है कि प्रोटॉनों का न्यूक्लियस में मौजूद होना खुद एक कान्टीनुअस प्रोसेस का नतीजा है। दरअसल प्रोटॉन ऐसे कण हैं जिनपर पाज़िटिव इलेक्ट्रिक चार्ज होता है। इलेक्ट्रानिक थ्योरी के मुताबिक अगर दो पाज़िटिव चार्ज आसपास रखे हैं तो उनके बीच प्रतिकर्षण बल (Repulsive Force), लगता है, जिसकी वजह से वे एक दूसरे से दूर जाने लगते हैं। यहाँ आक्सीजन के न्यूक्लियस में आठ प्रोटान एक दूसरे से मिले हुये मौजूद हैं। इलेक्ट्रानिक थ्योरी के अनुसार इन्हें बिखर जाना चाहिये। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसकी वजह है एक निहायत पावरपुल न्यूक्लियर फोर्स जिसकी खोज बीसवीं सदी में जापानी साइंटिस्ट युकावा ने की थी। ये न्यूक्लियर फोर्स एक कान्टीनुअस प्रोसेस से पैदा होता है। इस कान्टीनुअस प्रोसेस में न्यूक्लिआन्स (प्रोटान और न्यूट्रान) टूटकर मेसॉनों को पैदा करते हैं, ये मेसॉन दूसरे प्रोटॉनों और न्यूट्रानों से जुड़कर नये न्यूक्लिआन्स बनाया करते हैं। ये प्रोसेस एक कान्टीनुअस प्रोसेस है जिसके नतीजे में न्यक्लियाई फोर्स पैदा हो जाता है। अगर ये फोर्स ज़रा भी कमज़ोर पड़ जाये तो आक्सीजन (या किसी भी एलीमेण्ट) का वजूद खत्म हो जायेगा।

आज की मैथमैटिक्स अभी तक अनकाउन्टेबिल सेट से आगे नहीं बढ़ सकी है। जार्ज कैन्टर की सेट थ्योरी के अनुसार अगर कोई काउन्टेबिल सेट है, तो उसका किसी दूसरे काउन्टेबिल सेट के साथ बराबर का सम्बन्ध् (One to one relation), होता है। ‘बराबर का सम्बन्ध्’ से मतलब है कि पहले सेट का हर सदस्य दूसरे सेट के एक और सिर्फ एक सदस्य के साथ जुड़ा होता है। यही बात दूसरे सेट के साथ लागू होती है। मान लिया एक सेट है प्राकृतिक संख्याओं का (1, 2, 3, .....), और दूसरा सेट है सम संख्याओं का (2, 4, 6,,....) यहाँ 1 जुड़ा है 2 के साथ, 2 - 4 के साथ, 3-6 के साथ, और 4 का सम्बन्ध् 8 के साथ है। इस तरह पहला सेट दूसरे के साथ बराबर का सम्बन्ध् रख रहा है। लेकिन अगर एक सेट काउंटेबिल है और दूसरा अनकाउंटेबिल तो उनमें बराबर का सम्बन्ध् नहीं होता। बल्कि अनकाउन्टेबिल सेट बड़ा होता हैं। अलबत्ता दो अनकाउंटेबिल सेट्‌स के बीच बराबर का सम्बन्ध् होता है।

माना एक सेट है 0 से 1 के बीच सभी वास्तविक संख्याओं का और दूसरा सेट है 1 सेमी0 लम्बी सीधी रेखा पर मौजूद बिंदुओं का। अगर इस रेखा का पहला बिन्दु 0 से जुड़ा हुआ और आखिरी बिन्दु 1 से जुड़ा हुआ मानें तो इस रेखा का हर बिन्दु पहले सेट की संख्याओं के साथ बराबर का सम्बन्ध् रखता है। इसकी वजह ये है कि दोनों ही सेट अनकाउंटेबिल और कान्टीनुअस हैं। अब टाइम (वक्त) के बारे में सोचते हैं। वक्त का सेट कान्टीनुअस सेट होता है (बारह बजे के ठीक बाद कौन सा वक्त होगा आप बता सकते हैं ?) इसका मतलब है टाइम सेट के पैमाने पर किसी भी अनकाउंटेबिल सेट को नापा जा सकता है यानि टाइम सेट का किसी भी अनकाउंटेबिल सेट के साथ बराबर का सम्बन्ध् होता है।

अन्त में एक सवाल, ‘‘क्या कोई ऐसा भी अनन्त है जिसे वक्त के पैमाने पर नहीं मापा जा सकता?’’ फिलहाल गणित की थ्योरी अभी इस सवाल के जवाब तक नहीं पहुँच पायी है।

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