Saturday, May 16, 2015

मोदी के बीते एक साल के कार्यकाल में कुछेक समस्याओं को छोड़कर उम्मीद का वातावरण बना है।

मोदी के बीते एक साल के कार्यकाल में कुछेक समस्याओं को छोड़कर उम्मीद का वातावरण बना है। पर उम्मीदों को ठोस परिणामों में अनुदित होना होगा। सिर्फ उम्मीद पर लगातार नहीं चला जा सकता है। भाग्य मोदी के साथ रहा है, कच्चे तेल के भाव 120 डॉलर प्रति बैरल से पचास-पचपन प्रति बैरल आए, अब फिर सत्तर डॉलर प्रति बैरल की ओर उन्मुख हैं। पर मोदी सरकार आास्त हो सकती है कि ये भाव फिर 120 डॉलर प्रति बैरल पर नहीं पहुंचने वाले। लेकिन अगले एक साल में रोजगार के मसले पर कुछ ठोस डिलीवर नहीं हुआ, तो विपक्षी दलों को यह कहने का मजबूत मौका मिल जाएगा कि बातों को परिणामों में बदलना मोदी के बूते की बात नहीं है
अर्थव्यवस्था पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक साल काट चुकी है, शेयर बाजार के एंगल से देखें तो स्थितियां उतनी चमकदार नहीं दिख रही हैं, जितनी चार-पांच महीने पहले दिखाई दे रही थीं। पिछले एक साल में (12 मई, 2014 से 11 मई, 2015) मुंबई शेयर बाजार के इंडेक्स सेन्सेक्स का हिसाब-किताब देखें तो इसमें 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। सत्रह परसेंट साल का रिटर्न भी कम नहीं होता, पर इसी इंडेक्स ने कुछ महीनों पहले सालाना रिटर्न तीस परसेंट का दिया था, तब उम्मीदों का चरम था। शेयर बाजार उम्मीदों और आशंकाओं के अतिरेक पर चलता है। शेयर बाजार के अलावा दूसरे आंकड़े देखें तो अर्थव्यवस्था में अधिकांश जगह चमक की तस्वीर उभरती है, पर कुछेक इलाके ऐसे हैं, जो भारी चिंता में डालने वाले हैं। वित्त मंत्री अरु ण जेटली राजकोषीय घाटे को लगाम देने में कामयाब रहे हैं। वर्ष 2014-15 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 4.1 प्रतिशत रहा। इससे पहले के साल में यह 4.5 प्रतिशत था। अरु ण जेटली घाटा काम करने की ईमानदार कोशिशें करते दिख रहे हैं। विकास दर लगातार बेहतरी की ओर जाती दिख रही है। वर्ष 2014-15 में अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.4 प्रतिशत रहने के आसार हैं। वर्ष 2013-14 में यह दर 6.9 प्रतिशत रही थी। खेती के मोर्चे पर चिंता बनी हुई है, वर्ष 2014-15 में खेती की विकास दर 1.1 प्रतिशत रहने के आसार हैं। वर्ष 2013-14 में खेती का विकास 3.7 प्रतिशत की दर से हुआ था। खेती विकट चिंता का विषय है। किसानों को सब्सिडी का सतत याचकत्व कैसे खत्म किया जाए, इस पर मोदी सरकार को गंभीर चिंतन करना होगा। ‘‘मेक इन इंडिया’ फोकस रहा है मोदी सरकार का। वर्ष 2014-15 में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का विकास करीब 2.2 प्रतिशत की दर से हुआ। इससे पहले यानी 2013-14 में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र डूब रहा था, गिरावट 0.8 प्रतिशत की दर्ज की गई थी। महंगाई के मोर्चे पर मोदी सरकार के पक्ष में खड़े हैं आंकड़ें। कुछ अपवादों के साथ। बारह मई, 2015 को जारी आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ता सूचकांक के आधार पर अप्रैल, 2015 में महंगाई में पूरे देश में 4.87 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी जो आइटम अप्रैल, 2014 में 100 रु पये का मिलता था, वो आइटम अप्रैल, 2015 में 104.87 रुपये का गया। महंगाई के मोर्चे पर मोदी सरकार कह सकती है कि एक साल पहले कंज्यूमर महंगाई दर 8.48 प्रतिशत थी, जो अब गिर कर 4.87 परसेंट पर आ गई है। पर मसला सिर्फ इतना नहीं है। दालों ने पिछले एक महीने में आम आदमी को रु ला दिया है। दालों के भाव एक महीने में ही चालीस परसेंट बढ़ गए हैं। यह कैसे हुआ, और इससे निपटा कैसे जाए? इन सवालों के जवाब मोदी सरकार को तलाशने होंगे। मतलब कि सीन कुछ यूं बन रहा है कि लंबी दूरी के धावक के बतौर मोदी सरकार शानदार तरीके से दौड़ रही है, पर शॉर्ट टर्म के मामले में हांफती-सी दिख रही है। खाने-पीने की चीजों की महंगाई अर्थव्यवस्था की बाकी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है, इस बात को मोदी सरकार को समझना होगा। महंगाई के आंकड़े चिंता के सबब12 मई, 2015 को आए महंगाई के आंकड़े राजनीतिक तौर पर मोदी सरकार के लिए चिंता के कुछ विषय पेश करते हैं। अप्रैल 2014 के मुकाबले अप्रैल, 2015 में जम्मू-कश्मीर में कंज्यूमर सूचकांक पर आधारित महंगाई 8.07 प्रतिशत बढ़ी-भाजपा शासित या भाजपा गठबंधन शासित राज्यों-पंजाब में महंगाई 4.57 परसेंट, राजस्थान में 6.45, गुजरात में 5.04 और मध्य प्रदेश में 4.78 परसेंट बढ़ी जबकि गैर-भाजपा शासित राज्य उत्तराखंड में महंगाई 2.64 परसेंट, यूपी में 3.44, बिहार में 3.54 और प. बंगाल में 2.31 परसेंट बढ़ी। क्या गैर-भाजपा सरकारें महंगाई प्रबंधन में भाजपा सरकारों से बेहतर हैं? यह सवाल हाल के आंकड़े पूछते हैं। इसका राजनीतिक जवाब मोदी सरकार को देना होगा। विदेशी निवेशकों की रु चि भारत में पिछले साल में बढ़ी है। चिंता का विषय रोजगार का मसला है। नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने से पहले रोजगार के मसले पर ठोस करने का इरादा जताया था। अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी की साड़ियों को जोरदार ब्रांड बना कर उनकी मार्केटिंग की बात कही थी। ये सारी बातें इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि देश का युवा बेहतर रोजगार, बेहतर जीवन शैली की प्रतीक्षा बहुत बेसब्री से कर रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में बेरोजगारी दर करीब पांच परसेंट है, पर 18 से 29 साल के आयु वर्ग में बेरोजगारी की दर करीब 13 परसेंट है। यह वर्ग बहुत बेसब्रा हो सकता है। तमाम औद्योगिक परियोजनाओं में नौजवानों को रोजगार मिले तो हालात बेहतर होंगे। निवेश के सहमति-पत्रों के साइन होने की खबरें तो बहुत आ रही हैं, पर किसी प्लांट से सैकड़ों-हजारों लोगों को रोजगार मिला, ऐसी खबरें नहीं आ रहीं। यानी इस मोर्चे पर मोदी सरकार को स्पीड बढ़ानी होगी। रोजगार सामने मिलता दिखना चाहिए। बातें, वादे तो बहुत सालों से सुने ही जा रहे हैं। कुल मिलाकर एक साल में कुछेक समस्याओं को छोड़ कर उम्मीद का वातावरण बना है। पर उम्मीदों को ठोस परिणामों में अनुदित होना होगा। सिर्फ उम्मीद पर लगातार नहीं चला जा सकता है। भाग्य मोदी के साथ रहा है, कच्चे तेल के भाव 120 डॉलर प्रति बैरल से पचास-पचपन प्रति बैरल आए, अब फिर सत्तर डॉलर प्रति बैरल की ओर उन्मुख हैं। पर मोदी सरकार आास्त हो सकती है कि ये भाव फिर 120 डॉलर प्रति बैरल नहीं पहुंचने वाले। अगले एक साल में रोजगार के मसले पर कुछ ठोस डिलीवर नहीं हुआ, तो विपक्षी दलों को यह कहने का मजबूत मौका मिल जाएगा कि बातों को परिणामों में बदलना मोदी के बूते की बात नहीं है।

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